शैलेन्द्र चौधरी।

दवाई का रिएक्शन होने पर तीमारदारों व निजी अस्पताल कर्मियों मे नोकझोंक… तीमारदार ने लगाया एक महा 2 दिन में करीब ₹500000 का बिल वसूलने का आरोप अस्पताल में भर्ती मरीजों से पैसा वसूलने के मामले में अब्बल नंबर है निजी अस्पताल वाले यहां तक कि बहुत से निजी अस्पतालों में तो अत्याधुनिक बार व पब की तर्ज पर रख रखे है बाउंसर लंबे चौड़े पहलवान टाइप के दिखने वाले यह दबंग अक्सर अस्पतालों में बाउंसर के रूप में नियुक्त कर लिए जाते हैं जब कोई व्यक्ति मोटा बिल देने में आनाकानी करता तो उसकी रही सही कसर इन बाउंसर द्वारा पूरी करवाई जाती है और फिर कानूनन भी इन निजी अस्पताल वालों को काफी संरक्षण प्राप्त होता है बहुत कम निजी अस्पताल है जहां पर मानवीय संवेदना व सेवा भावना को दृष्टिगत रखते हुए भर्ती गंभीर मरीजों के साथ पैसा वसूलने में थोड़ी नरमी से पेश आया जाता हो ठिरिया निजावत खां थाना कैंट क्षेत्र के 40 वर्षीय रईस मियां काफी माह पहले 15 जून 2019 को एक अपराधी द्वारा गोली मारे जाने पर गंभीर रूप से घायल हो गए थे पदारथपुर निवासी शाहिद पुत्र काले खां ने रईस को गोली मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था करीब चार पांच माह से रईस के परिजन उसको लेकर परेशान हैं स्थानीय राममूर्ति अस्पताल सफदरगंज अस्पताल नई दिल्ली तत्पश्चात हजियापुर स्थित एक निजी हॉस्पिटल में गत करीब 1 माह 2 दिन से भर्ती रईस को कल से दवाई द्वारा रिएक्शन हो गया पूरे शरीर पर भयंकर एलर्जी व चकत्ते उत्पन्न हो गए संबंधित अस्पताल के चिकित्सक से शिकायत करने पर वह उल्टा परिजनों पर ही राशन पानी लेकर चढ़ बैठे और कानूनी कार्यवाही कर मुकदमा लिखवा कर जेल भिजवाने की धमकी देने लगे वाद विवाद की सूचना पर पुलिस भी निजी अस्पताल पहुंच गई परंतु भर्ती मरीज की मेडिसन खाने के कारण गंभीर हालत या तीमारदारों की मजबूरी बिल्कुल भी नहीं देखी गई उल्टा चिकित्सक ने पुलिस के सामने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि अब हम इस मरीज का उपचार नहीं कर सकते लिहाजा इसको जहां लेकर जाना चाहे इनके तीमारदार ले जा सकते हैं लापरवाही के चलते पिछले दिनों प्रेम नगर क्षेत्र स्थित एक निजी अस्पताल में चिकित्सक की लापरवाही के कारण एक बिटिया की मौत भी हुई मंगलम स्वीट के स्वामी राकेश सारस्वत को निजी अस्पताल की लापरवाही व गलतियों का बहुत बड़ा खामियाजा अपनी 23 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर बिटिया की जान देकर चुकाना पड़ा और आज भी वह न्याय के लिए परेशान हाल भटकते फिर रहे हैं लेकिन सिस्टम के अंतर्गत चलने वाले लाखों करोड़ों रुपयों के वारे न्यारे करने वाले निजी अस्पताल ना जाने कब अपनी मानवता को त्यागपत्र दे चुके हैं

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