CZeeNews सम्बद्ध राय मोर्चा(साप्ताहिक) सत्यम शिवम् सुन्दरम

सत्यम शिवम सुंदरम News,Knowledge,समाचार,ज्ञान,धर्म

चिकित्सकों को समर्पित,चिकित्सक भगवान तो नहीं हैं,पर उससे कम भी नहीं हैं जब हमारी जान पर बन आती है।

1 min read
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

निरंजन धुलेकर की कलम से

आय एम विद डॉक्टर्स !

डॉक्टर्स यानी चिकित्सको के साथ जो सुलूक वेस्ट बंगाल में हुआ उसकी जिनती भर्त्सना की जाय कम है ।

चिकित्सा केंद्र यानी हॉस्पिटल्स में मरीज एक आशा ले कर जाता है कि उसकी पीड़ा का इलाज़ होगा , डॉक्टर उसे देखेंगे और दवाई दे कर रोग और दर्द मुक्त करेंगे ।

हममें से सभी लोग डॉक्टर के पास किस स्तिथि में गए थे याद कीजिये .. असहनीय पीड़ा से जब शरीर और मन व्यालकुल हो तब डॉक्टर किसी देवदूत जैसे ही लगते हैं ।

उनको चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान हमारे लिए वरदान सिद्ध होता है और छोटी छोटी गोलियों कैप्सूल्स में जैसे अमृत आ बैठता है और हमे तुरंत आराम भी मिल जाता है ।

इसीलिए आज भी डॉक्टर्स का समाज मे सबसे बड़ा आदरणीय स्थान होता है और हम सभी लोग उनकी बहुत इज़्ज़त करते हैं ।

पर अगर ये डॉक्टर्स ही अगर हत्या और मारपीट का शिकार हो जाएंगे तो हमे बचाएगा कौन ?

हस्पताल तो एक बिल्डिंग मात्र होती है ,उसकी आत्मा तो ये डॉक्टर्स ही होते हैं , अगर ये ही निकल जाएंगे तो हॉस्पिटल्स निर्जीव शरीर से ज़्यादा कुछ नहीं ।

डॉक्टर्स की भी अपनी समस्याएं होती हैं जिनका निराकरण संवेदनशीलता से किया जाना चाहिए ।

जैसे अन्य सरकारी संस्थानों की सुरक्षा के लिए फोर्सेज होती हैं वैसे ही होस्पिटल , डॉक्टर्स और अन्य आस्तियों की सुरक्षा की भी समुचित और प्रभावी व्यवस्था होनी ही चाहिए ।

कोई डॉक्टर नही चाहता कि वो मेरी को अवेलेबल बेस्ट सुविधा न दे ।

ये सेवा सुश्रुषा का भाव उनकी धमनियों में बहता है , सरकार को मरीजों को और उनके साथ आये सहायकों की भी बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वो अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहें और डॉक्टर्स और स्टाफ के साथ मर्यादित व्यवहार करें ।

चिकित्सा सेवा को जिस तरह से वहाँ घिनौनी राजनीति ने प्रताड़ित किया है ये बेहद खौफनाक है ये किसी भी कीमत पर मान्य नहिं ।

आज मैं स्वस्थ हूँ और ये लिख भी रहा हूँ पर यदि मुझे एक सौ तीन बुखार होता , पेट मे दर भयानक होता , या मुझे चक्कर आ रहा होता या आंखों में चोट लगी होती तो मुझे उस डॉक्टर के सिवा कुछ न सूझता जो मुझे ठीक करने वाली दवाइयों का कोर्स चालू करता ।

मरीजों की पीड़ा सबसे ऊपर होती है और उसे ऊपर वाला ही याद आता है और वो यही प्रार्थना करता है की है भगवान !
डॉक्टर साहब मुझे जल्दी से देख कर कोई ऐसी दवाई दे दें जिससे मैं तुरंत आराम महसूस कर सकूं ।

हम सभी को इन डॉक्टर्स के प्रति जो कुछ दुर्व्यवहार हो रहा है उसके ख़िलाफ़ एकजुट होना ही पड़ेगा ।

और कोई चारा भी तो नही है , हम हैं तो बीमारी है , बीमारी है तो डॉक्टर्स हैं और डॉक्टर्स हैं इसीलिये हम भी हैं ,स्वस्थ और तंदुरुस्त ।

मैं डॉक्टर्स के साथ हूँ .. क्यूंकि मैं एक शरीर हूँ जिसका इलाज़ डॉक्टर्स को भली भांति आता है । हम दोनों एक दूसरे के लिए ही पैदा हुए हैं , साथ जिएंगे और साथ ही हँसी खुशी जिएंगे भी ।

क्यूंकि आयी हुई मौत को कोई टाल नही पाया … न मरीज , न हॉस्पिटल न ही सपोर्टिंग स्टाफ न दवाइयां और न ही कोई डॉक्टर ।

निरंजन धुलेकर ।

You may have missed

× How can I help you?
WhatsApp chat